तेरा घर भी जनता है , वो पत्थर भी जनता है ! की में तेरा आशिक हु , ये अम्बर भी जनता है । में पूरा दिखता हु पर अधूरा हु कही तुझ बिन ! ये तू भी समजती है , ये शहर भी जनता है । ...
न कोई गीत सुहानी है , न कोई ग़ज़ल ही भाता है । जब भी तुम रूठि हो , कलम भी रुठ जाता है । ये क्या सिल्ला मिला मुझे मोहब्बत में मेरे मौला ! में जिसको बहुत हसाया हु ,वो मुझको बहुत रूलाता है। - दिव्यांश पाठक
हा थोड़ी ख़ुशी मिली हमको ,हा थोड़े गम मिले हमको ! ख़ुशी हो या गम दोनों में आंख नम मिले हमको। ज़माने को भी मिल गए हम ,तुमको भी मिल गए हम! पर न तुम मिली हमको , न ही हम मिले हमको। - दिव्यांश पाठक