अधूरा

तेरा घर भी जनता है , वो पत्थर भी जनता है !
की में तेरा आशिक हु , ये अम्बर भी जनता है ।
में पूरा दिखता हु पर अधूरा हु कही तुझ बिन !
ये तू भी समजती है , ये शहर भी जनता है ।
                                          - दिव्यांश पाठक

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